पाठक का पत्र आया था सितंबर 2024 में। संध्या जी ने लिखा था कि वे और राजेश अपनी कहानी बाँटना चाहते हैं। हमने मसूरी में उनसे फ़ोन पर बात की। दोनों अब वहीं बसे हैं।
संध्या 61 की हैं, मूलतः दिल्ली ग्रेटर कैलाश से। विधवा, पति को आठ साल पहले खोया। एक बेटी ऑस्ट्रेलिया में। राजेश 64 के हैं, पहले मुंबई में बैंक में थे। तलाक़शुदा, 12 साल हो चुके। दो बेटे, दोनों भारत में।
मसूरी का संगीत क्लब
मसूरी के माल रोड से थोड़ा ऊपर, एक 70 साल पुराने कॉलोनियल बंगले में, एक संगीत क्लब है। हर शनिवार शाम छह बजे वहाँ "जम सेशन" होता है। कोई फ़ीस नहीं — सदस्य आते हैं, शास्त्रीय संगीत गाते हैं, सुनते हैं, चाय और कुछ नमकीन होता है।
संध्या वहाँ पहली बार फरवरी 2023 में गई थीं। वे मसूरी में अपनी एक सहेली के घर दो हफ़्ते के लिए आई थीं। सहेली ने कहा: "शनिवार क्लब चलते हैं। तुम्हें संगीत पसंद है।"
पहली शाम
"मुझे संगीत बचपन से पसंद था," संध्या बताती हैं। "शादी के बाद कम हो गया था। पति को संगीत में इतनी रुचि नहीं थी।"
पहली शाम क्लब में क़रीब बीस लोग थे। बैठक पुराने सोफ़ों पर। एक तरफ़ हारमोनियम, तबला। एक बुज़ुर्ग सज्जन सुर सुना रहे थे।
संध्या पीछे बैठ गईं। ख़ामोशी से सुनती रहीं। बीच में चाय का दौर। वहाँ एक व्यक्ति ने उनसे परिचय किया — "आप नयी हैं?"
वह राजेश थे। क्लब के नियमित सदस्य, दो साल से मसूरी में थे।
दूसरी बार
संध्या अगले शनिवार को फिर गईं। उनकी सहेली साथ नहीं थी इस बार। उन्होंने अकेले जाने का फ़ैसला किया।
"यह फ़ैसला लेते हुए मुझे अजीब लगा। 60 की हूँ, अकेले किसी क्लब में जा रही हूँ जहाँ ज़्यादा किसी को नहीं जानती।"
राजेश फिर मिले। इस बार बात थोड़ी लंबी। दोनों ने पाया — दोनों को किशोरी अमोनकर पसंद हैं। दोनों ने पंडित जसराज को सुना है लाइव। संगीत से बातचीत बढ़ी।
शाम के अंत में राजेश ने कहा: "अगले हफ़्ते पंडितजी आ रहे हैं बनारस से, संगीत उत्सव है। अगर आप अभी मसूरी में होंगी, ज़रूर आइए।"
तीसरी शाम — बात
तीसरी शाम पंडितजी का कार्यक्रम था। ढाई घंटे का। संगीत के बाद क्लब ने रात का खाना रखा था। संध्या और राजेश एक ही टेबल पर बैठे।
"हमने खाने के दौरान कुछ नहीं कहा। बस खाया, संगीत के बारे में सुना। फिर खाने के बाद हम बाल्कनी पर निकले। पहाड़ नीचे थे, धुंध थी।"
वहाँ राजेश ने पूछा: "आप कहाँ रहती हैं ज़्यादातर?"
"दिल्ली।"
"अकेले?"
"आठ साल हो गए पति के जाने को।"
"मुझे खेद है।" फिर राजेश ने कहा: "मैं तलाक़शुदा हूँ। बारह साल। यहाँ मसूरी में दो साल से हूँ।"
यह पहली वास्तविक निजी बातचीत थी। दोनों ने अपनी सच्चाइयाँ रखीं, कोई सजावट नहीं।
पत्र
संध्या की मसूरी यात्रा ख़त्म हुई। वे दिल्ली लौट गईं। मगर क्लब से एक दिलचस्प चीज़ हुई — राजेश ने उनका पता लिया था, और उन्होंने एक पत्र भेजा। हाथ से लिखा। आज के समय में विरल।
पत्र में उन्होंने किशोरी अमोनकर की एक पुरानी रिकॉर्डिंग के बारे में लिखा था जो उन्होंने उस हफ़्ते सुनी। कुछ पंक्तियाँ साझा कीं। पूछा था: "क्या आपने यह सुनी है?"
संध्या ने जवाब दिया। हाथ से। अगले महीने दोनों के बीच चार-पाँच पत्रों का आदान-प्रदान हुआ।
"पत्र लिखना अजीब लगा। मगर फ़ोन या मैसेज से वह अंतरंगता नहीं थी। पत्र में आप ध्यान से सोचते हैं।"
दूसरी मसूरी यात्रा
मई 2023 में संध्या फिर मसूरी गईं। इस बार एक हफ़्ते के लिए, सहेली के घर। शनिवार क्लब तो नियमित, मगर अब राजेश के साथ अलग से भी मिलना शुरू। मसूरी के पुराने चर्च के बगीचे में चलना। कैफ़े में कॉफ़ी।
मसूरी की यात्रा के बाद संध्या लौटीं दिल्ली। मगर अब दोनों रोज़ फ़ोन पर बात करते थे। शाम सात बजे, आधा घंटा।
"यह नया अनुभव था," संध्या कहती हैं। "इस उम्र में किसी से इतना जुड़ना — अजीब लगा, और अच्छा भी।"
बेटियों और बेटों की मुलाक़ात
चार महीने बाद दोनों ने अपने बच्चों को बताया। संध्या की बेटी ऑस्ट्रेलिया से वीडियो कॉल पर। राजेश के बेटे व्यक्तिगत रूप से। दोनों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी — शायद इसलिए क्योंकि संध्या और राजेश दोनों की कहानियाँ एक-दूसरे के बच्चों को भी स्पष्ट थीं।
"मेरी बेटी ने कहा 'माँ, अगर आप ख़ुश हैं, मैं ख़ुश हूँ। मगर शादी मत कीजिए जल्दी।' मैंने उसे समझाया — हम शादी के बारे में नहीं सोच रहे अभी।"
मसूरी में बसना
2024 की शुरुआत में संध्या ने मसूरी में एक छोटा फ़्लैट किराए पर लिया। दिल्ली का अपना घर बरकरार — बेटी के लिए, और वसीयत के लिए। मगर साल के नौ महीने वे अब मसूरी में रहती हैं।
राजेश का अपना फ़्लैट है, दो-तीन सौ मीटर दूर। LAT व्यवस्था। दोनों क्लब के नियमित। रविवार को दोनों साथ पहाड़ पर चलते हैं। मंगलवार को बाज़ार अलग जाते हैं।
वे क्या कहना चाहते हैं
"हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात," संध्या कहती हैं, "यह थी कि हम दोनों अपनी-अपनी कहानियाँ पूरी लेकर मिले। हम किसी को 'भूलने' नहीं आए थे। हमारे पति-पत्नी हमारे अंदर हैं। नया रिश्ता उन्हें मिटाता नहीं।"
"और संगीत ने हमें मिलाया। किसी ऐप ने नहीं। मसूरी के एक पुराने बंगले में, जहाँ साठ-सत्तर के लोग शनिवार शाम जमा होते हैं, वहाँ हमारा शुरू हुआ।"
राजेश ने अंत में जोड़ा: "60 के बाद लोग सोचते हैं कि अब 'एडवेंचर' ख़त्म। यह झूठ है। हमारे पास अपनी ज़िंदगी का एक नया अध्याय है। कुछ और साल हैं। इन सालों को जीना ज़रूरी है।"