एक दृश्य कल्पना कीजिए। दिल्ली ग्रेटर कैलाश का एक कैफ़े। शनिवार दोपहर तीन बजे। आप 54 साल के हैं, बीस साल बाद पहली डेट पर बैठने वाले हैं। आप कॉफ़ी का कप उठाते हैं और अचानक पाते हैं कि हाथ थोड़ा काँप रहा है।
यह 54 साल का कंपन नहीं है। यह 27 साल का कंपन है। वही लड़का या लड़की जो आपके अंदर तब से नहीं बैठा — शादी की वजह से दबा दिया गया था — आज ऊपर आ रहा है।
पुराना मैं कौन है
जब आपकी शादी हुई थी, आप एक तय रूप में थे। फिर बीस, पच्चीस साल तक आप "पति", "पत्नी", "माँ", "पिता" बने। ये भूमिकाएँ आपके ऊपर ऐसे जम गईं जैसे पुरानी पेंट।
मगर उसके नीचे वही पुराना आप है। वह जिसने पहली बार किसी से कहा था "मुझे आप अच्छे लगते हैं।" वह जिसे अस्वीकृति से डर था। वह जिसने पहली बार हाथ पकड़ा था।
पहली नई डेट उसी परत को खुरच कर बाहर लाती है। यह विचित्र अनुभव है, और इसकी तैयारी कोई नहीं करता।
चार आम लौटते डर
मैंने दर्जनों पाठकों से बात की है जो 40 के बाद फिर डेटिंग पर आए। इन चार डरों में से कम से कम एक सबने महसूस किया।
- "मैं उबाऊ हूँ।" यह डर उनका है जो शादी में हमेशा चुप या कम बोले थे। पहली नई डेट पर फिर वही चुप्पी आती है। अंदर कहता है — इसको क्या ही बात करूँ, मेरा जीवन तो घर-ऑफ़िस है।
- "क्या मैं देखने में अच्छा लग रहा हूँ।" पुणे कोरेगाँव की एक 48 साल की पाठिका ने बताया — वे पहली डेट पर पहुँचीं और बाथरूम में जाकर शीशे में तीन बार बाल ठीक किए। "जैसे मैं कॉलेज में वापस थी।"
- "अगर वह पसंद न करें तो।" यह अस्वीकृति का प्राचीन डर है। किशोर उम्र का। आपने सोचा था कि शादी के बाद इस डर से आज़ाद हो गए। नहीं। वह सिर्फ़ सोया था।
- "क्या मुझे अच्छा बात-चीत करना आता है।" जब आपने बीस साल से एक ही व्यक्ति से बात की है, तो बातचीत का कौशल थोड़ा कठोर हो जाता है। नए व्यक्ति के सामने यह ख़याल आता है कि शायद मैं "रुक गया" हूँ।
पहचानना ही आधा इलाज है
जब आप कैफ़े में बैठें, और हाथ काँपे, तो अपने से कहिए: "यह 27 साल वाला मैं है, 54 साल वाला नहीं।" यह छोटा-सा स्वीकार आपके कंधों से आधा भार उतार देता है।
क्योंकि सच यह है — आप 54 साल के हैं। आपने बच्चे बड़े किए। आपने शायद व्यवसाय चलाया। किसी अपने को दफ़नाया। आप उस लड़के से बहुत आगे हैं। उसे पहचानकर, कंधे पर हाथ रखकर, फिर वापस बिठाइए।
सामने वाला भी यही झेल रहा है
एक बात भूलिए मत। वह व्यक्ति जो आपके सामने बैठा है, वे भी 50+ हैं। उनके अंदर भी वही पुराना डरा हुआ 23 साल का कोई बैठा है। आप दो लोग नहीं हो, चार हो।
इसलिए मेरी सलाह: पहली डेट पर "कैसी ज़िंदगी थी" पूछिए। कहानी के लिए जगह बनाइए। जब वे बताएँगे, तो उनका पुराना वाला और नया वाला दोनों बोलेंगे। आप सुनकर शांत हो जाएँगे।
कौन-सी भूमिका लाकर न बैठें
यह महत्वपूर्ण है। पहली डेट पर "माँ" या "पिता" वाली भूमिका लाकर मत बैठिए। "व्यवसायी" वाली भूमिका भी मत लाइए। ये भूमिकाएँ सुरक्षित लगती हैं, मगर सामने वाला आपकी ख़ुद की झलक चाहता है, आपके काम की नहीं।
हैदराबाद बंजारा हिल्स के एक 56 साल के पाठक, तलाक़शुदा, ने मुझे बताया कि उनकी पहली दो डेट असफल हुईं क्योंकि वे लगातार अपने बच्चों की बात करते रहे। तीसरी डेट पर उन्होंने तय किया — एक बार भी "मेरा बेटा" नहीं कहूँगा पहले एक घंटे में। वह डेट सफल रही। क्योंकि सामने वाली उनसे मिल पाईं, उनके बेटे से नहीं।
एक छोटी तकनीक
घर से निकलने से पहले शीशे के सामने खड़े हो जाइए। और अपने आप से कहिए: "आज जो मिलने जा रहा हूँ, वह बड़ा भी है और बच्चा भी। दोनों को बोलने दूँगा।"
यह छोटी प्रार्थना नहीं, यह आत्म-स्मृति है। आप इसे किसी मंदिर के नियम की तरह रख लीजिए। यह काम करती है।
फिर जाइए। हाथ काँपे तो काँपने दीजिए। आप तैयार हैं — दोनों आप।